
स्वांगियां माता : राजस्थान
के जनमानस में आस्था की प्रतीक लोकदेवियों, कुलदेवियों के उद्भवसूत्र पर
यदि दृष्टि डाली जाये तो हम पायेंगे कि शक्ति की प्रतीक बहुत सी प्रसिद्ध
देवियों का जन्म चारणकुल में हुआ है। चारणकुल में जन्मी प्रसिद्ध देवियों
में आवड़, स्वांगियां, करणी माता आदि प्रमुख है। विभिन्न राजवंशों की
गौरवगाथाओं के साथ इन देवियों की अनेक चमत्कारिक घटनाएँ इतिहास के पन्नों
पर दर्ज है। वीर विनोद के लेखक श्यामलदास ने चारणों की उत्पत्ति देव सर्ग
में बतलाते हुये उनकी गणना देवताओं में की है। इसके लिए उन्होंने
श्रीमद्भागवत का संदर्भ दिया है। चारणकुल में जन्मी इन देवियों ने अपने
जीवनकाल में ही प्रत्यक्ष चमत्कारों के बलबूते राजस्थान के आम जन मानस को
नहीं, तत्कालीन शासकों को भी प्रभावित किया है। यही कारण है कि इन देवियाँ
को इनके जीवनकाल में ही जहाँ आम जनता ने ईष्टदेवी के रूप में मान्यता दी,
वहीं शासकों ने इन्हें अपने कुल की देवी के रूप में स्वीकार किया। राजस्थान
के प्रत्येक राजवंश ने देवीशक्ति के महत्त्व को मानते हुए अपने राज्य की
स्थापना को कुलदेवी का आशीर्वाद माना तथा विभिन्न युद्धों में विजयी होने
और राज्य के चहुँमुखी विकास में सफल होने पर अपनी कुलदेवी में पूर्ण आस्था
रखते हुए अनेकानेक भव्य मंदिरों का निर्माण कराया व उनकी पूजा अर्चना का
पुख्ता प्रबंध करवाते हुए जन जन में देवी के प्रति आस्था की अलख जगाई।
उतर
भड़ किंवाड़ के विरुद से विभूषित, शक्ति के उपासक राजस्थान में जैसलमेर
के भाटी राजवंश ने चारणकुल में जन्मी देवी स्वांगियां को शक्ति का प्रतीक
मानते हुए कुलदेवी के रूप में स्वीकार किया। स्वांगियां जिसे आवड़ माता के
नाम से भी जाना जाता है, की भाटी राजवंश की गौरवगाथाओं के साथ अनेक
चमत्कारी घटनाएँ जुड़ी है।
ऐसी
मान्यता है कि देवी आवड़ के पूर्वज जो सउवा शाखा के चारण थे, सिंध के
निवासी थे। उनका गौपालन के साथ घोड़ों व घी का व्यवसाय था। उसी परिवार का एक
चेला नामक चारण मांड प्रदेश (वर्तमान जैसलमेर) के चेलक गांव में आकर बस
गया। उसके वंश में मामड़िया नाम का एक चारण हुआ, जिसके जिसके घर सात कन्याओं
ने जन्म लिया। लोकमान्यता के अनुसार मामड़िया चारण के संतान नहीं थी, सो
संतान की चाहत में उसने संवत 808 में हिंगलाज की यात्रा की। तब हिंगलाज ने
ही सात कन्याओं के रूप में उसके घर जन्म लिया। इन सातों कन्याओं में सबसे
बड़ी कन्या का नाम आवड़ (aavad) रखा गया। मांड प्रदेश में अकाल के वक्त ये
परिवार सिंध में जाकर हाकड़ा नदी के किनारे कुछ समय रहा। जहाँ इन बहनों ने
सूत कातने का कार्य भी किया। इसलिए ये कल्याणी देवी कहलाई। फिर आवड़ देवी की
पावन यात्रा और जनकल्याण की अद्भुत घटनाओं के साथ ही क्रमशः सात मंदिरों
यथा काला डूंगरराय का मंदिर, भादरियाराय का मंदिर, तन्नोटराय का मंदिर,
तेमड़ेराय का मंदिर, घंटीयाली राय का मंदिर, देगराय का मंदिर, गजरूप सागर
देवालय का निर्माण हुआ और समग्र मांड प्रदेश में लोगों की आस्था उस देवी के
प्रति बढती गई।(हुकुम सिंह भाटी, राजस्थान की कुलदेवियां, पृष्ठ-44)
सिंध
से लौटने पर क्षेत्र के लोगों ने जिस गांव में देवी का अभिनन्दन किया उस
गांव का नाम आइता रखा गया और देवी ने गांव के पास स्थित काले रंग की पहाड़ी
जिसे स्थानीय भाषा में डूंगर कहा जाता है, पर आवास किया। जहाँ चमत्कारों की
चर्चा सुनने के बाद लोद्रवा के परमार राजा जसभाण ने उपस्थित होकर देवी के
दर्शन किये। बाद में ‘‘यहाँ संवत 1998 में महारावल जवाहरसिंह ने मंदिर का
निर्माण कराया।(हुकुम सिंह भाटी, राजस्थान की कुलदेवियां, पृष्ठ-45)
जैसलमेर से 25 किलोमीटर दूर काले रंग की पहाड़ी पर बने मंदिर को काला
डूंगरराय मंदिर के नाम से जाना जाता है तथा डूंगर पर मंदिर होने के कारण
स्थानीय लोगों में माता का नाम डूंगरेचियां भी प्रचलन में है।
डा.हुकम
सिंह भाटी के अनुसार बहादरिया भाटी के अनुरोध पर देवी आवड़ अपनी बहनों के
साथ आकर एक टीले पर रुकी। जहाँ राव तणु भाटी ने पहुँच कर दर्शन किये और
लकड़ी के बने हुए आसन (सहंगे) पर देवी को विराजमान किया गया। तीन बहनों को
दाई ओर तथा तीन को बाईं तरफ खड़ा किया और अपने हाथ से चंवर ढुलाए। तब आवड़ जी
ने आशीर्वाद देते हुए कहा-‘‘मांड प्रदेश में तुम्हारे वंशजों की स्थायी
राजधानी स्थापित होगी और वहां पर तुम्हारा राज्य अचल होगा।’’ सहंगे पर
बैठने के कारण आवड़ जी स्वांगियां कहलाई।
इस
प्रकार राव तणु भाटी के बाद भाटी राजवंश ने देवी आवड़ जी को स्वांगियां
माता के नाम से कुलदेवी के रूप में स्वीकार किया। बहादरिया भाटी के अनुरोध
पर देवी जिस टीले पर आई बाद में उस जगह का नाम भादरिया पड़ा। जो जैसलमेर के
शासकों के साथ ही स्थानीय जनता की श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। कहा जाता
है कि संवत 1885 में बीकानेर और जैसलमेर की सेनाओं के मध्य युद्ध हुआ,
जिसमें स्वांगियांजी के अदृश्य चक्रों से बीकानेर सेना के अनेक सैनिक मारे
गये और बाकी भाग खड़े हुए। तब तत्कालीन महारावल ने भादरिया में भव्य मंदिर
का निर्माण कराया। आज भी भाटी वंश के लोग अपनी इस कुलदेवी के प्रति पूर्ण
आस्था रखते है तथा देवी के प्रतीक के रूप में त्रिशूल का अंकन कर धूप दीप,
पूजा-अर्चना आदि के रूप में उपासना करते है।माता स्वांगियां का एक मंदिर
भारत-पाक सीमा पर तन्नोट गांव में भी है। जैसलमेर से लगभग एक सौ तीस कि॰मी॰
की दूरी पर तनोट राय को हिंगलाज माँ का ही एक रूप माना जाता है। हिंगलाज
माता जो वर्तमान में बलूचिस्तान जो पाकिस्तान में है, स्थापित है। भाटी
राजपूत नरेश तणुराव ने वि.सं. 828 में तनोट का मंदिर बनवाकर मूर्ति को
स्थापित कि थी। भाटी तणुराव द्वारा निर्मित इस मंदिर में सैकड़ों वर्षों से
अखण्ड ज्योति आज तक प्रज्वलित है। तणुराव भाटी द्वारा निर्मित होने के कारण
इस मंदिर को तनुटिया तन्नोट मंदिर के नाम से जाना जाता है। 1965 ई. में
हुए भारत-पाक युद्ध में भारतीय सेना के पक्ष में देवी द्वारा दिखाये
चमत्कार के बाद मंदिर की देखरेख, पूजा अर्चना का कार्य सीमा सुरक्षा बल के
जवानों द्वारा सम्पादित किया जाता है। 1965 ई. में हुए भारत-पाक युद्ध में
पाक सेना ने भारतीय क्षेत्र में शाहगढ़ तक आगे बढ़कर लगभग 150 किलोमीटर कब्जा
कर तन्नोट को घेर बम वर्षा की। पर देवी की कृपा से 3000 पाकिस्तानी बमों
में से एक भी नहीं फटा। जिससे क्षेत्र में कोई नुकसान नहीं नहीं हुआ। अकेले
मंदिर को निशाना बनाकर करीब 450 गोले दागे गए। परंतु चमत्कारी रूप से एक
भी गोला अपने निशाने पर नहीं लगा और मंदिर परिसर में गिरे गोलों में से एक
भी नहीं फटा और मंदिर को खरोंच तक नहीं आई।
सैनिकों
ने यह मानकर कि माता अपने साथ है, कम संख्या में होने के बावजूद पूरे
आत्मविश्वास के साथ दुश्मन के हमलों का करारा जवाब दिया और उसके सैकड़ों
सैनिकों को मार गिराया। दुश्मन सेना भागने को मजबूर हो गई। कहते हैं
सैनिकों को माता ने स्वप्न में आकर कहा था कि जब तक तुम मेरे मंदिर के
परिसर में हो मैं तुम्हारी रक्षा करूँगी।
इसी
तरह माता के घंटियालीराय मंदिर में इसी युद्ध में पाक सैनिकों ने
मूर्तियों को खंडित कर माता के कोपभाजन का शिकार बने। प्रतिमाओं को खंडित
करने वाले पाक सैनिकों के मुंह से खून निकलने लगा और वे अपने शिविर में
पहुँचने से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हुए। इस तरह की घटना के बाद भारतीय
सेना के जवानों के साथ स्थानीय जनता में माता के प्रति श्रद्धा और अधिक बढ़
गई।
Kuldevi
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जय स्वांगिया माता
ReplyDeleteयदु वंशी श्रीकृष्ण की कुलदेवी माँ कालिका ने महाभारत के युद्ध के समय श्रीकृष्ण के मम्मा कंश के ससुर राक्षस जरासंध के वध के लिए अपनी कुलदेवी का आवाहन किया, माँ कालिका ने जरासंध के हाथ से भाला जो जरासंध ने देवताओं से वरदान में प्राप्त किया था माँ
Deleteकालिका ने भाला छीनकर भीम को दिया और भीम ने भला रहित जरासंध का वध किया इसलिए माँ कालिका जो कि माँ दुर्गा का कात्यायनी स्वरूप है माँ स्वांग ग्रहणी कहलाई।।