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राजा जगतपाल सिंह का शापित किला – एक शाप के कारण किला बन गया खंडहर

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Jagatpal Singh Cursed Fort Story in Hindi : झारखण्ड की राजधानी से 18 किलोमीटर की दुरी पर, रांची-पतरातू मार्ग के पिठौरिया गांव में 2 शताब्दी पुराना राजा जगतपाल सिंह का किला है।  किसी जमाने में 100 कमरो वाला विशाल महल अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। इसके खंडहर में तब्दील का कारण इस किले पर हर साल बिजली गिरना है।  आश्चर्य जनक रूप से इस किले पर दशको से हर साल बिजली गिरती आ रही है जिससे की हर साल इसका कुछ हिस्सा टूट कर गिर जाता है। दशको से ऐसा होते रहने के कारण यह किला अब बिलकुल खंडहर हो चुका है। आप माने या ना माने लेकिन गांव वालो के अनुसार इस किले पर हर साल बिजली एक क्रांतिकारी द्वारा राजा जगतपाल सिंह को दिए गए श्राप के कारण गिरती है।  वैसे तो बिजली गिरना एक प्राकृति घटना है लेकिन एक ही जगह पर दशको से लगातार बिजली गिरना जरूर आश्चर्य की बात है।

Cursed fort of King Jagatpal Singh : Story, History & Information in Hindi
खंडहर हो चुके महल के अवशेष

कौन थे राजा जगतपाल सिंह :
इतिहासकारो के अनुसार पिठौरिया प्रारम्भ से ही मुंडा और नागवंशी राजाओ का प्रमुख केंद्र रहा है।  यह इलाका 1831-32 में हुए कौल विद्रोह के कारण इतिहास में अंकित है। पिठौरिया का राजा जगतपाल सिंह ने चहुमुखा विकास किया  उसे व्यापार और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बनाया। वो क्षेत्र की जनता में काफी लोकप्रिय थे लेकिन उनकी कुछ गलतीयों ने उनका नाम इतिहास में खलनायको और गद्दारो की सूचि में शामिल करवा दिया।
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Kahani Jagatpal singh ke saapit kile ki
खंडहर हो चुके महल के अवशेष
क्या थी गलतीयां :
सबसे पहली गलती तो उन्होंने 1831 के विद्रोह के समय की। 1831 में सिंदराय और बिंदराय के नेतृत्व में आदिवासियों ने आंदोलन किया था लेकिन यहाँ की भौगोलिक परस्तिथियों से अनजान अंग्रेज़ विद्रोह को दबा नहीं पा रह थे। इसलिए अंग्रेज़ अधिकारी विलकिंगसन ने राजा जगतपाल सिंह के पास सहायता का सन्देश भिजवाया जिसे की जगतपाल सिंह ने स्वीकार करते हुए अंग्रेजो मदद की। उनकी इस मदद के बदले तत्कालीन गवर्नर जनरल विलियम वैंटिक ने उन्हें 313 रुपए प्रतिमाह आजीवन पेंशन दी। दूसरा और सबसे बड़ा गुनाह उन्होंने 1857 की क्रान्ति में किया।
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खंडहर हो चुके महल के अवशेष
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों को रोकने के लिए उन्होंने पिठौरिया घाटी की घेराबंदी की थी,ताकि क्रांतिकारी अपने मकसद में सफल न हो सके। इतना ही नहीं वे क्रांतिकारियों की हर गतिविधियों की जानकारी अंग्रेज तक पहुंचाते थे। राजा के प्रति नाराजगी इस कदर व्याप्त थी उस समय क्रांतिकारी ठाकुर विश्वनाथ नाथ शाहदेव  उन्हें सबक सिखाने पिठौरिया पहुंचे और उन पर आक्रमण किया । बाद में वे गिरफ्तार हो गए और जगतपाल सिंह की गवाही के कारण उन्हें 16अप्रैल 1858 को रांची जिला स्कूल के सामने कदम्ब के वृक्ष पर फांसी पर लटका दिया गया। जानकार बताते है कि उनकी ही गवाही पर कई अन्य क्रांतिकारियों को भी फांसी पर लटकाने का काम किया गया।
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खंडहर हो चुके महल के अवशेष
विशवनाथ ने दिया था श्राप :
लोगो की मान्यता है  कि विश्वनाथ शाहदेव ने जगतपाल सिंह को अंग्रेजों का साथ देने और देश के साथ गद्दारी करने पर यह शाप दिया कि आनेवाले समय में जगतपाल सिंह का कोई नामलेवा नहीं रहेगा और उसके किले पर हर साल उस समय तक वज्रपात होता रहेगा, जबतक यह किला पूरी तरह बर्बाद नहीं हो जाता।   तब से हर साल पिठोरिया स्थित जगतपाल सिंह के किले पर वज्रपात हो रहा है। इस कारण यह किला खंडहर में तब्दील हो चुका है।
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राजा जगत पाल सिंह के द्वारा बनवाया गया तालाब

वैज्ञानिक बताते है दूसरे कारण :
वैज्ञानिक इस किले पर बिजली गिरने के दूसरे ही कारण बताते है उनके मुताबिक यहाँ मौजूद ऊँचे पेड़ और पहाड़ो में मौजूद लोह अयस्को की प्रचुरता दोनों मिलकर आसमानी बिजली को आकर्षित करने का एक बहुत ही सुगम माध्यम उपलब्ध कराती है जिस कारण बारिश के दिनों में यहाँ अक्सर वज्रपात होता रहता है।  लेकिन लोगो का सवाल यह है की यह किला जब दशको तक आबाद रहा तब क्यों नहीं बिजलियाँ गिरी जबकि उस वक़्त आज से ज्यादा पेड़ और लोह अयस्क था।
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किला परिसर में बने शिव मंदिर के अवशेष
मिलती है मुग़ल वास्तुकला की झलक :
राजा जगत पाल सिंह का यह दो मंजिला महल लगभग 30 एकड़ में फैला हुआ था जिसमे की 100 से ज्यादा कमरे थे। यह किला लाल रंग का था जो की पत्थरो, ईटो और चुने से बना था। इस महल की खासियत यह थी की इसमें मुगलकालीन वास्तुकला का प्रयोग किया गया था।  इसके अलावा उन्होंने रानियों के नहाने के लिए तालाब और पूजा के लिए एक शिव मंदिर भी बनवाया था।  तालाब तो अभी भी सही सलामत है पर मंदिर खंडहर हो चूका है।
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नक्काशीदार गेट
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कापूचिन कैटाकॉम्ब (Capuchin Catacombe) – एक अनोखा कब्रिस्तान जहाँ रखे हैं सदियों पुराने 8000 शव – कमजोर दिल वालो के लिए नहीं हैं यह जगह

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हमने Ossuary पर एक सीरीज शुरू कि थी जिसकी पहली कड़ी में हमने आपको  Sedlec Ossuary  के बारे में बताया था जिसे कि वहाँ दफनाये गए 40000 शवो कि हड्डियों से सजाया गया हैं। इसकी दूसरी कड़ी में हम आज आपको बता रहे हैं एक ऐसे अनोखे अंडरग्राउंड कब्रिस्तान के बारे में जिसमे 8000 शवो को ममी बनाकर जिन्दा रखा गया हैं। ये कब्रिस्तान हैं Capuchin Catacombe जो कि इटली के सिसली शहर में स्तिथ हैं।
Capuchin Catacombe - Italy


Catacombe का हिंदी में मतलब अंडरग्राउंड कब्रिस्तान होता हैं जो कि प्राचीन रोम में बहुतायत से पाये जाते थे। लेकिन Capuchin Catacombe अन्य Catacombe से बिलकुल अलग हैं क्योकि यहाँ शवों को दफनाने कि जगह उनकी ममी बनाकर सजा रखा हैं।
ये कब्रिस्तान अंदर से बिलकुल एक म्यूजियम कि तरह है जहा कि शवो को रखने के लिए अलग अलग सेक्शन बने हुए हैं जैसे कि महिलाओं का , पुरुषों का , बच्चों का, कुवारी कन्याओं का, संतो का , टीचर्स का , डॉक्टर्स का, सैनिकों का इत्यादि।

ये घिनोने कीड़े भी है लोगों का भोजन
Capuchin Catacombe - Monk's corridor
Monk’s section
Capuchin Catacombe - Women section
Women section
Capuchin Catacombe में प्रथम ममी 1599 में बनाई गयी थी जो कि ब्रदर सिल्वेस्ट्रो कि थी।  1880 में अधिकृत रूप से इस कब्रिस्तान को बंद कर दिया गया था फिर भी कभी कभार कुछ शव इसमें आ जाते थे। 1920 में इस कब्रिस्तान में आखरी ममी बनाई गयी  जो कि एक बच्ची कि थी जिसका नाम रोसलिया लबाडरे था। यह ममी इस कब्रिस्तान में रखी गयी सबसे खूबसूरत ममी है क्योकि इस ममी को देखने पर ऐसा लगता ही नहीं हैं कि यह कोई ममी बल्कि ऐसा लगता है कि कोई प्यारी सी बच्ची सो रही हैं।  इसलिए इस ममी को Sleeping Beauty नाम दिया गया हैं।  यह आज तक भी रहस्य है कि इस ममी को संरक्षित करने में कोन से केमिकल काम में लिए गए थे जिससे कि यह ममी आज भी वैसी ही हैं।

sleeping beauty

शरू में Capuchin Catacombe कि स्थापना केवल कैथोलिक संतो (Frair) के शवों को संरक्षित करने के लिए कि गाय थी लेकिन बाद में इस कब्रिस्तान में जगह पाना सामाजिक रुतबे कि बात मानी जाने लगी और इसमें संतो के अलावा दूसरे शव भी आने लगे। इस कब्रिस्तान में शवों को रखने के लिए नियमित रूप से फीस चुकानी पड़ती थी। जिससे कि कब्रिस्तान का रख रखाव होता था।  यदि किसी ममी कि फीस आनी बंद हो जाती तो उस ममी को हटा दिया जाता।

Child's section

अब Capuchin Catacombe को टूरिस्ट के लिए खोल दिया गया हैं और यह इटली का एक प्रमुख आकर्षण बन गया हैं।यह कब्रिस्तान अंदर से जितना डरावना है उतना ही डरावना इस तक पहुचने का रास्ता है जो कि कई अँधेरी संकरी गलियों से हो कर गुजरता है जिनकी दीवारों पर भी ममी लटकी हुई हैं। इसलिए यदि आप यहाँ जाने कि सोचे तो एक बात का ध्यान रखे कि “कमजोर दिल वालो के लिए नहीं हैं यह जगह”।

Capuchin Catacombe
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गोवा के वीरान बंगलों में,Team Pentacle द्वारा भूतों का इन्वेस्टीगेशन – खिची तस्वीरें, रिकॉर्ड कि आवाज़ें

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भूत होते है या नहीं ये सदा से ही एक बहस का मुद्दा रहा है।  भूत – प्रेतों पर विश्वास और अविश्वास करने वाले इस बारे में अपने अपने तर्क देते है।  हम इन पर विश्वास करे या ना करे पर हर धर्म में  और हर सभ्यता में पारलौकिक ताकतों का वर्णन है। हाल ही में पारलौकिक शक्तियों कि इन्वेस्टीगेशन करने वाली संस्था Team Pentacle द्वारा गोवा में पूर्तगाली शासनकाल के समय के वीरान पड़े बंगलों में, अपने अत्याधुनिक उपकरणों के साथ पारलौकिक शक्तियों कि खोज कि गयी। अपनी इन्वेस्टिगेशन के दौरान टीम ने  न सिर्फ अदृश्य ताकत को कैमरे में कैद किया बल्कि उसकी आवाज भी रिकॉर्ड की है। गोवा में घोस्ट हंटिंग
बंगले का दरवाजा और नीले घेरे में झांकती हुई औरत की छाया
गोवा की राजधानी पणजी से करीब एक-डेढ़ घंटे की दूरी पर एक गांव में स्थित ये 100 साल से ज्यादा पुराने बंगले वहां रहने वाले पुर्तगालियों द्वारा बनाए गए थे। ये बेहद खूबसूरत बंगले अब सुनसान पड़े हैं। वजह, जो भी इनमें रहने जाता है, उन्हें अदृश्य ताकतें परेशान करने लगती हैं और अंतत: उन्हें घर छोडऩा पड़ता है।
‘टीम पेंटेकल’ के प्रेसिडेंट शिशिर कुमार सदस्यों- रोहित शर्मा, निशा वर्मा, विवेक जैन और विवेक तलवार के साथ 28 फरवरी को किसी दूसरे पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेशन के तहत गोवा में थे। तभी वहां के ग्रामीणों ने उन्हें उक्त बंगलों के बारे में बताया।
एक ही समय में ली गई दो तस्वीरें। डीएसएलआर द्वारा ली गई तस्वीर में कुछ नहीं है जबकि दाहिनी ओर फुल स्पेक्ट्रम कैमरे से ली गई तस्वीर में कुछ अलग दिखाई दे रहा है। 
रांची में रहने वाले टीम पेंटेकल के प्रेसिडेंट शिशिर कुमार ने बंगले की जो तस्वीर उपलब्ध कराई है उसमें साफ-साफ खिड़की के पास झांकती हुई एक महिला दिखाई दे रही है, जो इन्वेस्टिगेशन के दौरान वहां मौजूद ही नहीं थी। यह तस्वीर फुल स्पेक्ट्रम कैमरे से ली गई है। यह खास किस्म का कैमरा होता है, जिसका इस्तेमाल साइंटिफिक रिसर्च में इंफ्रारेड, अल्ट्रावॉयलेट आदि किरणों को कैप्चर करने में किया जाता है।
शिशिर के मुताबिक, पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेशन में साधारण डीएसएलआर से अदृश्य शक्तियों की तस्वीरें (पैरानॉर्मल सिग्नीफिकेंट) नहीं ली जा सकतीं। साधारण कैमरे से ली गई बंगले की तस्वीर में सिर्फ वही दिख रहा है, जिसे खुली आंखों से देखा जा सकता है।
डीएसएलआर द्वारा उस जगह की ली गई क्लोज अप तस्वीर, जहां से महिला झांकती हुई दिखाई दी।  
शिशिर ने बताया, “बिल्डिंग के बाहर से इन्वेस्टिगेशन के दौरान हमने साधारण डीएसएलआर और फुल स्पेक्ट्रम कैमरे से कई तस्वीरें ली। साथ ही इवीपी (इलेट्रॉनिक वॉयस फेनोमिना) रिकॉर्डिंग भी की। बाद में साउंड और पिक्चर्स के एनालिसिस में हमने पाया कि फुल स्पेक्ट्रम तस्वीर में खिड़की के पास एक और झांकती हुई दिखाई पड़ रही है। देश में पहली बार पैरानॉर्मल एनर्जी का फुल बॉडी अपरेशन हमने कैच किया है। विदेशों में ऐसा पहले भी हो चुका है।”
शिशिर ने बताया कि अदृश्य शक्ति के लगभग स्पष्ट रूप में दिखाई देने को ही पैरानॉर्मल की भाषा में ‘फुल बॉडी अपरेशन’ कहा जाता है। तस्वीर में दिखने वाली औरत कौन है, क्या है, इस बारे में कुछ नहीं बताया।
‘भूत’ ने बजाया गिटार, कहा- ‘शट अप’ :-
ईवीपी रिकॉर्डिंग के विश्लेषण के दौरान कुछ पैरानार्मल आवाजें भी सामने आईं। शिशिर ने बताया, “पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेशन के दौरान हमने जब उस अदृश्य ताकत को नियमत: ‘Make some noise’ (मेक सम नॉयज) का इंस्ट्रक्शन दिया तो सामान्यत:: जैसा होता है, कोई आवाज नहीं आई। पर ईवीपी (इलेक्ट्रॉनिक वॉयस फेनोमिना) के विश्लेषण के दौरान हमने साफ-साफ गिटार की ट्यून सुनी।” उन्होंने आगे कहा, “इतना ही नहीं ईवीपी एनालिसिस के दौरान हमने बिल्कुल विदेशी आवाज में ‘यू शट अप’ भी सुना। ये आवाज तब की है जब हमारी टीम टीम बंगले से बाहर निकल रही थी।”
क्या होता है भूत-प्रेत ? :-
तो क्या इसका मतलब यह मान लिया जाय कि भूत प्रेत साइंटिफिकली प्रूव हो गए हैं? इस सीधे सवाल पर शिशिर का कहना है कि अब तक के रिसर्च में उन्होंने जो जानकारी हासिल की है उसके मुताबिक आम लोग जिसे भूत-प्रेत कहते हैं, वे वास्तव में ‘एनर्जी पैकेट’ होते हैं। ब्रह्मांड में फैली ऊर्जा अक्सर सुनसान जगहों में एक जगह जमा हो जाती है और असामान्य परिस्थितियां पैदा करती है।
हालांकि, वे इस बात का दावा नहीं करते कि उनकी बातें शत प्रतिशत सही हैं। उन्होंने कहा, “जिस तरह के भूत-प्रेत की लोग बात करते हैं, उससे हमारा सामना अब तक नहीं हुआ। ज्यादातर केसेस काल्पनिक अथवा सायकेट्रिक निकले हैं। एक पैरानॉर्मल इन्वेस्टीगेटर को जिस दिन सचमुच भूत मिल जाए, उसका मकसद पूरा हो जाए।”
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रूपकुंड झील – उत्तराखंड – यह है नरकंकालों वाली झील

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यदि आप एडवेंचर ट्रैकिंग के शौक़ीन है तो रूपकुंड झील आपके लिए एक बेहतरीन जगह हैं। रूपकुंड झील (Roopkund lake ) हिमालय के ग्लेशियरों के गर्मियों में पिघलने से उत्तराखंड के पहाड़ों मैं बनने वाली छोटी सी झील हैं।
 Roopkund Lake - Uttrakhand
यह झील 5029 मीटर ( 16499 फीट )कि ऊचाई पर स्तिथ हैं जिसके चारो और ऊचे ऊचे बर्फ के ग्लेशियर हैं। यहाँ तक पहुचे का रास्ता बेहद दुर्गम हैं इसलिए यह जगह एडवेंचर ट्रैकिंग करने वालों कि पसंदीदा जगह हैं।
यह झील यहाँ पर मिलने वाले नरकंकालों के कारण काफी चर्चित हैं।  यहाँ पर गर्मियों मैं बर्फ पिघलने के साथ ही कही पर भी नरकंकाल दिखाई देना आम बात हैं।  यहाँ तक कि झील के अंदर देखने पर भी तलहटी मैं भी नरकंकाल पड़े दिखाई दे जाते हैं।

Human skeleton fond at Roopkund LAke
यहाँ पर सबसे पहला नरकंकाल 1942 मैं एक रेंजर H. K. Madhwal द्वारा खोज गया था। तब से अब तक यहाँ पर सैकड़ो नरकंकाल मिल चुके हैं। जिसमे हर उम्र व लिंग के कंकाल शामिल हैं। यहाँ पर National Geographic Team द्वारा भी एक अभियान चलाया गया था जिसमे उन्हें 30 से ज्यादा नरकंकाल मिले थे।
यहाँ पर इतने सारे नरकंकाल आये कैसे इसके बारे मैं तीन अलग अलग कहानिया प्रचलित हैं। 
ओलों की एक भयंकर बारिश
1942 में हुए एक रिसर्च से हड्डियों के
इस राज पर थोड़ी रोशनी पड़ सकती है। रिसर्च के अनुसार ट्रेकर्स का एक ग्रुप यहां हुई
ओलावृष्टि में फंस गया जिसमें सभी की अचानक और दर्दनाक मौत हो गई। हड्डियों के एक्स-रे
और अन्य टेस्ट्स में पाया गया कि हड्डियों में दरारें पड़ी हुई थीं जिससे पता चलता
है कि कम से कम क्रिकेट की बॉल की साइज़ के बराबर ओले रहे होंगे। वहां कम से कम 35 किमी तक कोई गांव नहीं था और सिर छुपाने की कोई जगह भी नहीं थी। आंकड़ों के
आधार पर माना जा सकता है कि यह घटना 850AD के आस पास की रही होगी।
Human skeleton fond at Roopkund LAke
रास्ता भटकते सैनिक
एक दूसरी किवदंती के मुताबिक
तिब्बत में 1841 में हुए युद्ध के दौरान सैनिकों का एक समूह इस मुश्किल रास्ते से गुज़र
रहा था। लेकिन वो रास्ता भटक गए और खो गए और कभी मिले नहीं। हालांकि यह एक फिल्मी प्लॉट
जैसा लगता है पर यहां मिलने वाली हड्डियों के बारे में यह कथा भी खूब प्रचलित है।
Skeleton lake - Uttrakhand
नंदा देवी का प्रकोप
अगर स्थानीय लोगों के माने तो उनके अनुसार एक बार एक राजा जिसका नाम जसधावल था, नंदा देवी की तीर्थ यात्रा पर निकला। उसको संतान की प्राप्ति होने वाली थी इसलिए वो देवी के दर्शन करना चाहता था। स्थानीय पंडितों ने राजा को इतने भव्य समारोह के साथ देवी दर्शन जाने को मना किया। जैसा कि तय था, इस तरह के जोर-शोर और दिखावे वाले समारोह से देवी नाराज़ हो गईं और सबको मौत के घाट उतार दिया। राजा, उसकी रानी और आने वाली संतान को सभी के साथ खत्म कर दिया गया। मिले अवशेषों में कुछ चूड़ियां और अन्य गहने मिले जिससे पता चलता है कि समूह में महिलाएं भी मौजूद थीं।
तो अगर आप सुपरनैचुरल और देवी-देवताओं में विश्वास करते हैं तो इस कहानी को मान सकते हैं। अपने साथ किसी स्थानीय व्यक्ति को ले जाइए और रात के समय यह कहानी उनसे सुनिए। आपके रोंगटे ज़रूर खड़े हो जाएंगे।
Roopkund lake - Uttrakhand
कुछ ऐसा है सफर रूपकुंड
झील तक का
इस मिस्टीरियस लेक जाने
के लिए लोहाजंग से रास्ता शुरू होता है जो कि करनप्रयाग से 85 किमी की दूरी पर है।
काठगोदाम स्टेशन से लोहाजंग के लिए आप टैक्सी ले सकते हैं। रिशिकेश से आ रहे हैं तो
वहां से करनप्रयाग तक बस ले सकते हैं। करनप्रयाग से 4-5 घंटे में आप लोहाजंग पहुंच
जाएंगे।
Traking path of Rooopkund lake
रुपकुंड झील की तरफ लॉर्ड
कर्ज़न ट्रेल को पकड़िए। नीलगंगा नदी के पुराने पुल को पार करके करीब 3 घंटे तक जंगली
पेड़ों के बीच ट्रेकिंग करनी होगी। आप जल्द ही एक वाटरफॉल के पास आ जाएंगे। आगे चलते
जाएंगे तो राउन बगाद पहुंचकर डिडिना की चढ़ाई करनी होगी। पास के गांव को फॉलो करते
रहिए और 2 घंटे में आप एक आसान जगह पहुंच जाएंगे जहां आप आराम कर सकते हैं।
अब आपकी अगली यात्रा डिडना
से बेदनी बुग्याल की होगी। अली की तरफ से जाने वाला रास्ता छोटा पर थोड़ा खड़ी चढ़ाई
वाला है। यहां से बुग्याल पहुंचने में आपको 3 घंटे करीब लगेंगे। एक दूसरा रास्ता टोपलानी
की तरफ से भी जाता है पर वो लंबा है। यहां आप रात गुजार सरते हैं और अगली सुबह स्नो
को फॉलो करते हुए चल पड़िए।
Traking path of Rooopkund lake
जल्दी निकलने से आप भगवाबासा
जल्द पहुंच जाएंगे जहां आप थोड़ा आराम कर सकते हैं। लोटानी से कालू विनायक की तरफ 4
घंटे की चढ़ाई के बाद गणेशा मंदिर पहुंच जाएंगे। आपके पास यहां रुकने का विकल्प है।
या तो आप भगवाबासा में ठहर जाइए या हूनिया थल पर कैंप लगा लीजिए। यहां रातें काफी ठंड़ी
होती हैं।
सुबह 5 बजे आप रुपकुंड
झील के अंतिम पड़ाव की ओर निकल पड़िए। बर्फ पिघलने से पहले शुरू हो जाइए। बर्फ काटने
के लिए साथ में कुल्हाड़ी लेते जाइए। झील का पहला नज़ारा आपको ज़रूर मंत्रमुग्ध कर
देगा। यह एक नीले रंग का बर्फीले शीशे जैसा दिखता है। बर्फ जमी होने पर भी इस पर चलने
की गलती मत कीजिएगा। अगर आपको यहां मिलने वाली हड्डियों की कहानियों से डर नहीं लगता
है तो यहां आप जब तक चाहें कैंप लगाकर आनंद ले सकते हैं।
Traking path of Rooopkund lake
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भानगढ़ किला (अलवर राजस्थान) Bhangarh fort (Alwar Rajasthan)

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Bhangarh Fort History & Story in Hindi : वैसे तो हमारे देश में बहुत से हॉन्टेड प्लेस है लेकिन इस लिस्ट में जिसका नाम सबसे ऊपर आता है वो है भानगढ़ का किला (Bhangadh Fort)। जो कि बोलचाल में “भूतो का भानगढ़” नाम से ज्यादा प्रसिद्ध है।
भानगढ़ का खंडहर हो चूका बाज़ार
भानगढ़(Bhangarh) कि कहानी बड़ी ही रोचक है 16 वि शताब्दी में भानगढ़ बसता है।  300 सालो तक  भानगढ़ खूब फलता फूलता है।  फिर यहाँ कि एक सुन्दर राजकुमारी  पर काले जादू में महारथ तांत्रिक सिंधु सेवड़ा आसक्त हो जाता है। वो राजकुमारी  को वश में करने लिए काला जादू करता है पर खुद ही उसका शिकार हो कर मर जाता है पर मरने से पहले भानगढ़ को बर्बादी का श्राप दे जाता है और संयोग से उसके एक महीने बाद ही पड़ौसी राज्य अजबगढ़ से लड़ाई में राजकुमारी सहित सारे भानगढ़ वासी मारे जाते है और भानगढ़  वीरान हो जाता है। तब से वीरान हुआ भानगढ आज तक वीरान है और कहते है कि उस लड़ाई में मारे गए लोगो के भूत आज भी रात को भानगढ़ के किले में भटकते है।क्योकि तांत्रिक के श्राप के कारण उन सब कि मुक्ति नहीं हो पाई थी।  तो यह है भानगढ़ कि कहानी जो कि लगती फ़िल्मी है पर है असली। तो आइये अब हम आपको भानगढ़ के उत्थान से पतन कि यह कहानी विस्तार से बताते है।

भानगढ़ – एक परिचय (Bhangarh – An Introduction) :-
भानगढ़ का किला, राजस्थान के अलवर जिले में स्तिथ है।  इस किले से कुछ किलोमीटर कि दुरी पर विश्व प्रसिद्ध सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान (Sariska National Park) है।  भानगढ़ तीन तरफ़ पहाड़ियों से सुरक्षित है। सामरिक दृष्टि से किसी भी राज्य के संचालन के यह उपयुक्त स्थान है। सुरक्षा की दृष्टि से इसे भागों में बांटा गया है। सबसे पहले एक बड़ी प्राचीर है जिससे दोनो तरफ़ की पहाड़ियों को जोड़ा गया है। इस प्राचीर के मुख्य द्वार पर हनुमान जी विराजमान हैं। इसके पश्चात बाजार प्रारंभ होता है, बाजार की समाप्ति के बाद राजमहल के परिसर के विभाजन के लिए त्रिपोलिया द्वार बना हुआ है। इसके पश्चात राज महल स्थित है। इस किले में कई मंदिर भी है जिसमे भगवान सोमेश्वर, गोपीनाथ, मंगला देवी और केशव राय के मंदिर प्रमुख मंदिर हैं। इन मंदिरों की दीवारों और खम्भों पर की गई नक़्क़ाशी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह समूचा क़िला कितना ख़ूबसूरत और भव्य रहा होगा। सोमेश्वर मंदिर के बगल में एक बाबड़ी  है जिसमें अब भी आसपास के गांवों के लोग नहाया करते हैं ।
 महल परिसर में स्तिथ बाबड़ी
भानगढ़ का इतिहास (History Of Bhangarh) :-
भानगढ़ क़िले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573  में बनवाया था। भानगढ़ के बसने के बाद लगभग 300 वर्षों तक यह आबाद रहा।  मुग़ल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल और भगवंत दास के छोटे बेटे व अम्बर(आमेर ) के महान मुगल सेनापति, मानसिंह के छोटे भाई राजा माधो सिंह ने बाद में (1613) इसे अपनी रिहाइश बना लिया।  माधौसिंह के बाद उसका पुत्र छत्र सिंह गद्दी पर बैठा।  विक्रम संवत 1722 में इसी वंश के हरिसिंह ने गद्दी संभाली।इसके साथ ही भानगढ की चमक कम होने लगी। छत्र सिंह के बेटे अजब सिह ने समीप ही अजबगढ़ बनवाया और वहीं रहने लगा। यह समय औरंगजेब के शासन का था। औरंगजेब कट्टर पंथी मुसलमान था। उसने अपने बाप को नहीं छोड़ा तो इन्हे कहाँ छोड़ता। उसके दबाव में आकर हरिसिंह के दो बेटे मुसलमान हो गए, जिन्हें मोहम्मद कुलीज एवं मोहम्मद दहलीज के नाम से जाना गया। इन दोनों भाईयों के मुसलमान बनने एवं औरंगजेब की शासन पर पकड़ ढीली होने पर जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह ने इन्हे मारकर भानगढ़ पर कब्जा कर लिया तथा माधो सिंह के वंशजों को गद्दी दे दी।
भानगढ़ किले कि ऊपरी मंजिले जो कि बिल्कुल खंडहर हो चुकी हैं
राजकुमारी रत्नावती और तांत्रिक सिंधु सेवड़ा (Rajkumari Ratnawati aur Tantarik Sindhu Devada) :-
कहते है कि भानगढ़ कि राजकुमारी रत्नावती बेहद खुबसुरत थी। उस समय उनके रूप की चर्चा पूरे राज्य में थी और देश के कोने कोने  के राजकुमार उनसे विवाह करने के इच्छु‍क थे। उस समय उनकी उम्र महज 18 वर्ष ही थी और उनका यौवन उनके रूप में और निखार ला चुका था। उस समय कई राज्योi से उनके लिए विवाह के प्रस्ता व आ रहे थे। उसी दौरान वो एक बार किले से अपनी सखियों के साथ बाजार में निकती थीं। राजकुमारी रत्नाथवती एक इत्र की दुकान पर पहुंची और वो इत्रों को हाथों में लेकर उसकी खुशबू ले रही थी। उसी समय उस दुकान से कुछ ही दूरी  सिंधु सेवड़ा नाम का व्यnक्ति खड़ा होकर उन्हेा बहुत ही गौर से देख रहा था।
सिंधु सेवड़ा उसी राज्य; में रहता था और वो काले जादू का महारथी था। ऐसा बताया जाता है कि वो राजकुमारी के रूप का दिवाना था और उनसे प्रगाण प्रेम करता था। वो किसी भी तरह राजकुमारी को हासिल करना चाहता था। इसलिए उसने उस दुकान के पास आकर एक इत्र के बोतल जिसे रानी पसंद कर रही थी उसने उस बोतल पर काला जादू कर दिया जो राजकुमारी के वशीकरण के लिए किया था। लेकिन एक विश्वशनीय व्यक्ति ने राजकुमारी को इस राज के बारे में बता दिया।
पहाड़ी कि चोटी पर तांत्रिक सिंधु सेवड़ा कि छतरी (जहा वो तांत्रिक साधना करता था)
राजकुमारी रत्नाकवती ने उस इत्र के बोतल को उठाया, लेकिन उसे वही पास के एक पत्थकर पर पटक दिया। पत्थर पर पटकते ही वो बोतल टूट गयी और सारा इत्र उस पत्‍थर पर बिखर गया। इसके बाद से ही वो पत्थर फिसलते हुए उस तांत्रिक सिंधु सेवड़ा के पीछे चल पड़ा और तांत्रिक को कुचल दिया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गयी। मरने से पहले तांत्रिक ने श्राप दिया कि इस किले में रहने वालें सभी लोग जल्दी ही मर जायेंगे और वो दोबारा जन्म नहीं ले सकेंगे और ताउम्र उनकी आत्मांएं इस किले में भटकती रहेंगी।
उस तांत्रिक के मौत के कुछ दिनों के बाद ही भानगढ़  और अजबगढ़ के बीच युद्ध हुआ जिसमें किले में रहने वाले सारे लोग मारे गये। यहां तक की राजकुमारी रत्नाचवती भी उस शाप से नहीं बच सकी और उनकी भी मौत हो गयी। एक ही किले में एक साथ इतने बड़े कत्लेउआम के बाद वहां मौत की चींखें गूंज गयी और आज भी उस किले में उनकी रू‍हें घुमती हैं।
किलें में सूर्यास्त के बाद प्रवेश निषेध (Entrance Prohibited after Sunset) :-
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा खुदाई से इस बात के पर्याप्त सबूत मिले हैं कि यह शहर एक प्राचीन ऐतिहासिक स्थल है। फिलहाल इस किले की देख रेख भारत सरकार द्वारा की जाती है। किले के चारों तरफ आर्कियोंलाजिकल सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) की टीम मौजूद रहती हैं। एएसआई ने सख्तक हिदायत दे रखी  है कि सूर्यास्ता के बाद इस इलाके में किसी भी व्यतक्ति के रूकने के लिए मनाही है।

भारतीय पुरातत्व के द्वारा इस खंडहर को संरक्षित कर दिया गया है। गौर करने वाली बात है जहाँ पुरात्तव विभाग ने हर संरक्षित क्षेत्र में अपने ऑफिस बनवाये है वहीँ इस किले के संरक्षण के लिए पुरातत्व विभाग ने अपना ऑफिस भानगढ़ से दूर बनाया है।
भानगढ़ किले के मंदिर ( Temple of Bhangarh) :-
जैसा कि हमने आपको बताया कि इस किले में कई मंदिर भी है जिसमे भगवान सोमेश्वर, गोपीनाथ, मंगला देवी और केशव राय के मंदिर प्रमुख मंदिर हैं।
सोमेश्वर महादेव मंदिर
इन मंदिरो कि एक यह विशेषता है कि जहाँ किले सहित पूरा भानगढ़ खंडहर में तब्दील हो चूका है वही भानगढ़ के सारे के सारे मंदिर सही है अलबत्ता अधिकतर मंदिरो से मुर्तिया गायब है। सोमेश्वर महादेव मंदिर में जरूर शिवलिंग है।
सोमेश्वर महादेव मंदिर के गर्भ गृह में स्तिथ शिवलिंग
दूसरी बात भानगढ़ के सोमेशवर महादेव मंदिर में सिंधु सेवड़ा तांत्रिक के वंशज ही पूजा पाठ कर रहे है। ऐसा हमे 2009 में हमारी भानगढ़ यात्रा के दौरान उस मंदिर के पुजारी ने बताया था। जब हमने उनसे भूतों के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि यहाँ भूत है यह बात सही है पर वो भूत किले के अंदर केवल खंडहर हो चुके महल में ही रहते है महल से निचे नहीं आते है क्योकि महल की सीढ़ियों के बिलकुल पास भोमिया जी का स्थान है जो उन्हें महल से बाहर नहीं आने देते है। उन्होंने यह भी कहा कि रात के समय आप किला परिसर में रह सकते है कोई दिक्क्त नहीं है पर महल के अंदर नहीं जाना चाहिए।

मंगला माता मंदिर
तो यह है भानगढ़ कि कहानी अब वहाँ भूत है कि नहीं यह एक विवाद का विषय हो  सकता है पर यह जरूर है कि भानगढ़ एक बार घूमने लायक जगह है और यदि आप भानगढ़ घूमने का प्रोग्राम बनाये तो हमारी यह राय है कि आप वहा सावन ( जुलाई -अगस्त ) में जाए क्योकि भानगढ़ तीनो तरफ से अरावली कि पहाड़ियो से घिरा हुआ है और  सावन में उन पहाड़ियो में बहार आ जाती है। और यदि आपको सोमेशवर महादेव मंदिर के पुजारी से भानगढ़ का इतिहास सुनना हो तो आप सोमवार के दिन जाए क्योंकि पुजारी जी सोमवार को पूरा दिन मंदिर में रहते है बाकी दिन तो सुबह पूजा करके वापस चले जाते है।
गोपीनाथ मंदिर
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